कभी अमेरिका-ब्रिटेन से भी ज्यादा अमीर था भारत, दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी की कहानी, तब कौन था राजा?
आज जब हम भारत को एक उभरती आर्थिक महाशक्ति के रूप में देख रहे हैं, तो यह समझना बेहद जरूरी है कि यह कोई नई शुरुआत नहीं है। भारत का आर्थिक उत्कर्ष कोई हालिया चमत्कार नहीं, बल्कि इसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं। एक समय था जब भारत पूरी दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्था था। न अमेरिका तब कहीं था, न ब्रिटेन का नाम लेने वाला कोई था। और इस स्वर्णिम काल का सबसे चमकता सितारा था मुगल सम्राट अकबर।
भारत: दुनिया की अमीरी का केंद्र
अगर आज से 400 साल पहले की दुनिया की कल्पना करें, तो उसमें सबसे रौशन नाम भारत का था। भारत उस समय न सिर्फ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध था, बल्कि आर्थिक रूप से भी पूरी दुनिया का सिरमौर था। शोध बताते हैं कि वर्ष 1000 ईस्वी में भारत की वैश्विक GDP में हिस्सेदारी 28.9% थी। यह आंकड़ा अपने-आप में बताता है कि भारत उस समय दुनिया की आर्थिक रीढ़ था।
मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल (1556-1605) में यह समृद्धि अपने चरम पर पहुंच गई थी। माना जाता है कि उस दौर में भारत के लोग ब्रिटेन, अमेरिका या चीन जैसे देशों के नागरिकों से कहीं ज्यादा अमीर थे।
अकबर का शासन
अकबर के शासन की खासियत सिर्फ उसके सैन्य विजय में नहीं थी, बल्कि उसके दूरदर्शी प्रशासन और आर्थिक नीतियों में थी। उसने ऐसे सुधार किए जिसने गांवों से लेकर राजमहलों तक हर वर्ग को लाभ पहुंचाया। उसका प्रशासनिक तंत्र इतना मजबूत था कि पूरे साम्राज्य में समान कानून, कर व्यवस्था और व्यापारिक नीति लागू थी।
“आइन-ए-अकबरी” में अबुल फज़ल लिखते हैं कि अकबर ने किसानों, दस्तकारों और व्यापारियों को आज़ादी और संरक्षण दिया। धार्मिक सहिष्णुता, न्यायप्रियता और आर्थिक नीतियों में संतुलन ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया जिसमें व्यापार, कृषि और उद्योग तीनों तेजी से फले-फूले।
कृषि और गांव- आत्मनिर्भर भारत की मिसाल
अकबर के दौर में भारत पूरी तरह कृषिप्रधान देश था। लेकिन ये कृषि केवल पेट भरने का साधन नहीं थी, बल्कि आर्थिक समृद्धि की नींव थी। हर गांव एक स्वावलंबी इकाई था, जहां से न सिर्फ भोजन, बल्कि व्यापारिक वस्तुएं भी उत्पन्न होती थीं।
गांवों में गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा जैसी फसलें ली जाती थीं, वहीं नील, कपास, गन्ना और सिल्क जैसी नकदी फसलें विदेशों में निर्यात होती थीं। यही नहीं, अकबर ने सिंचाई व्यवस्था, तालाबों और खेतों की जोत को बढ़ावा देकर किसानों को आत्मनिर्भर बनाया।
उद्योग, हस्तशिल्प और दुनिया भर में मांग
अकबर के भारत में दस्तकारी और हस्तशिल्प की कला अपने चरम पर थी। ढाका, कश्मीर, सूरत, मछलीपट्टनम जैसे केंद्रों से बना कपड़ा, सिल्क, शॉल और आभूषण दुनिया भर में मशहूर थे। यूरोप और एशिया के व्यापारी भारत से माल लेने के लिए बेताब रहते थे।
ब्रास, कॉपर, लकड़ी से बनी साज-सज्जा की चीजें, मसाले और टेक्सटाइल का निर्यात बड़े पैमाने पर होता था। भारत से जाने वाले कारवां सोने, चांदी, घोड़ों और कीमती पत्थरों के साथ वापस आते थे। यह व्यापार इतना सुनियोजित था कि आज की आधुनिक सप्लाई चेन भी उसके आगे फीकी लगे।
करेंसी, व्यापार और महंगाई
अकबर के शासन में सोने की मुहरें और चांदी के सिक्के चलते थे, जिन्हें अन्य देशों में भी स्वीकार किया जाता था। यह दिखाता है कि भारत की मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय साख कितनी मजबूत थी।
महंगाई पर नियंत्रण के लिए अलग-अलग प्रांतों में वस्तुओं के दाम तय थे। हालांकि एक प्रांत से दूसरे में कीमतें अलग हो सकती थीं, फिर भी स्थानीय बाजारों में स्थिरता बनी रहती थी। व्यापारियों, खासकर बंजारों, ने देशभर में माल के आवागमन को सुचारू रूप से संभाला।
राजस्व प्रणाली और किसानों की स्थिति
अकबर ने कर वसूली के लिए ज़मीन की पैदावार के आधार पर एक तिहाई हिस्सा रेवेन्यू के रूप में तय किया। हालांकि यह मालगुजारी कुछ ज्यादा थी, लेकिन इसके निर्धारण में ईमानदारी और स्थायित्व था। इससे किसानों को यह पता होता था कि हर साल कितना कर देना है, जिससे वे अपने संसाधनों की बेहतर योजना बना पाते थे।
भारत का इकोनॉमिक सर्किट
भारत का घरेलू व्यापार तंत्र बहुत मजबूत था। गांवों में बनने वाली वस्तुएं कस्बों और नगरों तक जाती थीं। व्यापार बैलगाड़ियों, ऊंटों और नावों से होता था। बंजारे साल भर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक माल पहुंचाते थे।
120 शहर और 3200 कस्बे अकबर के भारत में आर्थिक गतिविधियों के केंद्र थे। भारत का हर नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस आर्थिक प्रवाह का हिस्सा था।
भारत की गिरती अर्थव्यवस्था
अकबर के दौर के बाद भारत की आर्थिक रफ्तार बनी रही, लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद इसमें जबरदस्त गिरावट आने लगी। उन्होंने भारत को सिर्फ एक संसाधनों का खजाना समझा और बर्बर तरीके से उसका दोहन किया।
जहां 1700 में भारत की वैश्विक GDP में हिस्सेदारी 24.4% थी, वहीं 1950 तक यह घटकर सिर्फ 4.2% रह गई। 1979 तक तो यह और गिरकर 3% पर पहुंच गई। ये आंकड़े किसी युद्ध से नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद की नीतियों से भारत को खोखला करने की कहानी कहते हैं।
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