कट्टर दुश्मन हैं इजराइल-फिलिस्तीन, फिर भी दोनों देशों से भारत के मजबूत रिश्ते, कैसे बनाया है संतुलन?
PM Modi Israel Visit: मध्य पूर्व में इजराइल और फिलिस्तीन के बीच लंबे समय से संघर्ष चला आ रहा है। जमीन, सीमाओं और अधिकारों को लेकर दोनों के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण रहे हैं और इस टकराव में हजारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इसके बावजूद भारत ने दोनों देशों के साथ अपने संबंध संतुलित और मजबूत बनाए रखे हैं। यही भारत की कूटनीति की सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है।
भारत की विदेश नीति को समझने के लिए 1947 के बाद के दौर को देखना जरूरी है। उस समय जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी ने फिलिस्तीन के मुद्दे का समर्थन किया था। दोनों नेताओं ने धर्म के आधार पर देशों के बंटवारे के विचार को सही नहीं माना। उस समय भारत का झुकाव अरब देशों और गुटनिरपेक्ष नीति की ओर था।
इजराइल को मान्यता, लेकिन सीमित रिश्ते
हालांकि भारत ने 1950 में इजराइल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दे दी थी, लेकिन कई सालों तक दोनों देशों के बीच रिश्ते बहुत सीमित रहे। इजराइल को मुंबई में कॉन्सुलेट खोलने की अनुमति तो मिली, लेकिन नई दिल्ली में पूर्ण राजनयिक उपस्थिति नहीं दी गई।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भारत ने इजराइल से मदद भी मांगी थी, जिससे दोनों देशों के बीच संपर्क धीरे-धीरे बढ़ने लगा।
फिलिस्तीन के साथ गहरे संबंध
भारत ने 1975 में फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन को मान्यता दी और उसे दिल्ली में दफ्तर खोलने की अनुमति दी। उस समय यासिर अराफात और भारतीय नेताओं के बीच काफी करीबी रिश्ते थे।
1988 में भारत फिलिस्तीन को मान्यता देने वाले पहले गैर-अरब देशों में शामिल हुआ। इससे साफ था कि भारत फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों के समर्थन में खड़ा है।
1992 के बाद बदले रिश्ते
1992 में भारत ने इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। इसके बाद दोनों देशों के बीच सहयोग तेजी से बढ़ा। रक्षा, कृषि और तकनीक जैसे क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत होती गई।
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बीजेपी सरकार के बाद तेजी से बढ़ी नजदीकी
जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई, तो इजराइल के साथ रिश्तों में और तेजी आई। कारगिल युद्ध के दौरान इजराइल ने भारत की मदद की, जिससे भरोसा और मजबूत हुआ।
2003 में एरियल शेरोन भारत आने वाले पहले इजराइली प्रधानमंत्री बने। इसके बाद दोनों देशों के बीच सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ा।
मोदी दौर में खुले तौर पर मजबूत संबंध
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत-इजराइल संबंध और मजबूत हुए। 2017 में मोदी इजराइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इस दौरान व्यापार और रक्षा सहयोग में बड़ा इजाफा हुआ।
इजराइल आज भारत का एक अहम रक्षा साझेदार बन चुका है और दोनों देशों के बीच व्यापार भी लगातार बढ़ा है।
फिलिस्तीन के साथ भी जारी है समर्थन
इजराइल के साथ बढ़ती नजदीकी के बावजूद भारत ने फिलिस्तीन को नजरअंदाज नहीं किया। 2018 में प्रधानमंत्री मोदी फिलिस्तीन गए और वहां के राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मुलाकात की। भारत ने साफ किया कि वह फिलिस्तीनी लोगों के हितों के लिए प्रतिबद्ध है।
गाजा मुद्दे पर संतुलित रुख
हाल के वर्षों में गाजा में बिगड़ते हालात को लेकर भारत ने चिंता जताई है। भारत ने मानवीय सहायता भेजी है, जिसमें दवाइयां और मेडिकल सप्लाई शामिल हैं। साथ ही भारत ने हमेशा बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान निकालने की बात कही है।
भारत ने 2023 में इजराइल पर हुए हमलों की निंदा की, लेकिन साथ ही युद्धविराम, बंधकों की रिहाई और शांति वार्ता की भी अपील की।
यही है भारत की “बैलेंसिंग पॉलिसी”
भारत की नीति साफ है—
- इजराइल के साथ रणनीतिक और रक्षा सहयोग
- फिलिस्तीन के साथ मानवीय और राजनीतिक समर्थन
यानी भारत किसी एक पक्ष में खड़े होने के बजाय दोनों के साथ संतुलन बनाकर चलता है। यही वजह है कि दुश्मनी के बावजूद दोनों देश भारत के साथ अपने रिश्तों को महत्व देते हैं।
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