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Modi-Putin की 24 साल पुरानी केमिस्ट्री, तब अटल जी थे भारत के प्रधानमंत्री, कैसे हुई थी पहली मुलाकात?

Modi-Putin: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हितों को केंद्र माना जाता है, लेकिन भारत और रूस के रिश्ते इस सिद्धांत से ऊपर खड़े दिखाई देते हैं। खासकर जब बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हो, तो 24 साल पुराना भरोसा आज भी उतना ही मजबूत दिखता है।

इस अनोखे रिश्ते की शुरुआत 6 नवंबर 2001 को मॉस्को में हुई, जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल रूस के दौरे पर पहुंचा और नए-नए बने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार पुतिन से मिले।

वाजपेयी के साथ मोदी का रूसा दौरा

गुजरात में भूकंप का दौर था और मोदी को मुख्यमंत्री बने मुश्किल से एक महीना हुआ था। इसी बीच वाजपेयी ने उन्हें रूस के बेहद महत्वपूर्ण दौरे पर साथ ले जाने का फैसला किया।

यह निर्णय सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि वाजपेयी की राजनीतिक दूरदर्शिता का संकेत था। वे जानते थे कि मोदी प्रशासनिक और संगठनात्मक क्षमता के साथ एक ऐसे नेता हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच की जरूरत है।

पुतिन ने तोड़ दिया कूटनीति का प्रोटोकॉल

आमतौर पर किसी देश का राष्ट्रपति सिर्फ प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति स्तर के नेताओं से मिलता है। लेकिन 2001 में पुतिन ने इस प्रोटोकॉल की दीवार खुद गिरा दी।

मोदी बाद में कई इंटरव्यू में बताते हैं कि वे संकोच के साथ पुतिन से मिलने गए थे, लेकिन पुतिन ने ऐसा व्यवहार किया जैसे वे पुराने परिचित हों। यह फर्स्ट इंप्रेशन ही आगे चलकर दो नेताओं के बीच एक भरोसेमंद रिश्ता बन गया।

आस्ट्राखान एग्रीमेंट: मोदी का पहला विदेशी समझौता

इंटरनेट पर वायरल एक पुरानी तस्वीर इस रिश्ते का सबसे बड़ा प्रतीक है- वाजपेयी मुस्कुराते हुए बैठे हैं, नरेंद्र मोदी दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर रहे हैं और पुतिन बगल में खड़े हैं। यह गुजरात और रूस के आस्ट्राखान प्रांत के बीच हुआ समझौता था, जिसका उद्देश्य तेल, गैस और तकनीकी सहयोग बढ़ाना था।

मोदी के लिए यह पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता था, और भारत की विदेश नीति में यह पहली बार हुआ था कि किसी राज्य को सीधे किसी विदेशी प्रांत से समझौता करने का अवसर मिला।

ऊर्जा कूटनीति की शुरुआती झलक

आस्ट्राखान कैस्पियन सागर का महत्वपूर्ण क्षेत्र है और नॉर्थ–साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का भी बड़ा केंद्र। 2001 में ही मोदी ने यह समझ लिया था कि आने वाले समय में भारत की ऊर्जा सुरक्षा रूस और कैस्पियन क्षेत्र से गहराई से जुड़ने वाली है।

वाजपेयी की उपस्थिति यह संकेत भी थी कि वे मोदी को भविष्य के नेतृत्व के लिए तैयार कर रहे हैं।

2001 से 2014: परदे के पीछे की दोस्ती

मुख्यमंत्री के रूप में मोदी गुजरात में विकास के कामों में व्यस्त रहे, लेकिन रूस के साथ संपर्क बना रहा। 2002 के बाद जब पश्चिमी देशों ने मोदी पर वीज़ा रोक दिया, तब भी रूस ने उनके प्रति अपने दरवाजे बंद नहीं किए। पुतिन उन गिने-चुने वैश्विक नेताओं में रहे जिन्होंने मोदी पर भरोसा कभी नहीं खोया।

2014 के बाद दोस्ती का नया अध्याय

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी का रूस के साथ संबंध पहले दिन से ही आसान और सहज रहा। 2001 में बनी व्यक्तिगत समझ अब कूटनीति का मजबूत आधार बन चुकी थी।

2018 की सोची अनौपचारिक समिट इस रिश्ते की एक अनोखी मिसाल थी। न कोई फाइल, न कागज़ दोनों नेता समुद्र किनारे लंबी बातचीत करते दिखे। इस तरह की ‘फ्रीस्टाइल डिप्लोमेसी’ दुनिया में बहुत कम देखने को मिलती है।

S-400 पर भारत का दृढ़ फैसला

अमेरिका ने CAATSA के तहत प्रतिबंधों की धमकी दी, लेकिन भारत रूस से S-400 मिसाइल सिस्टम लेने के फैसले पर कायम रहा। यह वही भरोसा था जो दोनों देशों के बीच 24 साल में मजबूत हुआ था।

2022 में रूस–यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ तो पश्चिमी देशों ने भारत पर भारी दबाव डाला कि वह रूस की खुली आलोचना करे। लेकिन भारत ने संतुलन बनाते हुए न अपनी स्वतंत्र विदेश नीति छोड़ी और न रूस के साथ संबंधों को नुकसान पहुंचाया।

Shreeom Singh

Shreeom Singh is a Digital Journalist with over 3 years of experience in the media industry. Having worked with prestigious organizations like Bharat 24, Network 10, and APN News. Shreeom specializes in a wide spectrum of beats, including World, Sports, Business, Lifestyle, and Health. He is dedicated to delivering well-researched and engaging stories to a global audience.

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