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कभी खराब क्वालिटी का गेहूं भेजता था अमेरिका, अब US में छाया हुआ है भारतीय चावल, क्यों घबरा गए ट्रंप?

India-US Trade: 1960 के दशक में भारत की खाद्य सुरक्षा संकट में थी और उस समय अमेरिका ने भारत को खाद्यान्न देने के लिए PL‑480 स्कीम के तहत लाल गेहूं की सप्लाई की थी। उस गेहूं की गुणवत्ता इतनी खराब थी कि अमेरिका में इसे अक्सर जानवरों को खिलाया जाता था। आज, लगभग 60 साल बाद, स्थिति पूरी तरह बदल गई है। 2025 में भारत अमेरिका को उच्च गुणवत्ता वाला बासमती और गैर-बासमती चावल निर्यात कर रहा है, जिससे अमेरिकी बाजार में भारतीय चावल की डिमांड लगातार बढ़ रही है।

इस बढ़ती मांग ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गुस्से और टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

ट्रंप ने भारतीय चावल पर टैरिफ बढ़ाने की बात क्यों कही?

8 दिसंबर 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किसानों के लिए नई आर्थिक मदद का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि भारत, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों से सस्ते चावल के आयात के कारण अमेरिकी किसानों को नुकसान हो रहा है। ट्रंप ने इसे “डंपिंग” करार दिया, जिसका मतलब है कि कोई देश किसी वस्तु को उसके वास्तविक मूल्य से कम में बेच रहा है।

ट्रंप ने कहा, “भारत को डंपिंग नहीं करनी चाहिए। क्या उन्हें इसके लिए कोई विशेष छूट मिली है? अब उन्हें अतिरिक्त टैरिफ देना होगा।”

क्या भारत वास्तव में डंपिंग कर रहा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अमेरिका में डंपिंग नहीं बल्कि मांग के अनुसार चावल बेच रहा है।

  • भारत का बासमती और गैर-बासमती चावल गुणवत्ता में अमेरिकी चावल से बेहतर है।
  • अमेरिकी बाजार में भारतीय चावल की बढ़ती डिमांड को देखते हुए इसे डंपिंग कहना सही नहीं।
  • भारतीय चावल की बिक्री अमेरिकी किसानों के लिए खतरा नहीं है। यह सिर्फ उच्च गुणवत्ता वाला प्रीमियम प्रोडक्ट है।

वास्तव में अमेरिका भारत से हर साल 20% से ज्यादा चावल खरीदता है। वर्ल्ड इंटीग्रेटेड ट्रेड सॉल्यूशन के आंकड़ों के अनुसार, 2018 में अमेरिका के चावल आयात में भारत की हिस्सेदारी 23.3% थी, जो 2024 में बढ़कर 26.1% हो गई।

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भारत से अमेरिका का चावल निर्यात और टैरिफ

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका भारत का बासमती चावल का चौथा सबसे बड़ा और गैर-बासमती चावल का 24वां सबसे बड़ा खरीदार है।

2025 में भारत ने:

  • 2.74 लाख टन बासमती चावल, जिसकी कीमत लगभग 28.3 हजार करोड़ रुपए, अमेरिका को निर्यात किया।
  • 61 हजार टन गैर-बासमती चावल, जिसकी कीमत लगभग 5 हजार करोड़ रुपए, निर्यात की।

टैरिफ की बात करें तो अप्रैल 2025 तक भारत के चावल पर 10% कस्टम ड्यूटी लगती थी। अप्रैल में रेसिप्रोकल टैरिफ लागू होने के बाद 25% हो गई। अगस्त में रूसी तेल आयात विवाद के कारण 50% तक टैरिफ बढ़ गया।

अमेरिका में चावल की उगाई जाने वाली प्रमुख किस्में

इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, दुनिया में चावल की 1.2 लाख से अधिक किस्में हैं। अमेरिका में चावल मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में उगाया जाता है:

लॉन्ग ग्रेन राइस: लंबाई में लंबे, पकने पर चिपकते नहीं। अमेरिका में 75% यह चावल उगाया जाता है और यह स्टैंडर्ड व्हाइट राइस, US जैसमीन और US बासमती के रूप में बिकता है।

मीडियम ग्रेन राइस: आकार में थोड़े छोटे और मोटे, पकने पर हल्के चिपचिपे। अमेरिका में करीब 20% उत्पादन।

शॉर्ट ग्रेन राइस: गोल आकार का, पकने पर बहुत चिपचिपा। सुशी जैसी डिश में इस्तेमाल।

क्या भारतीय चावल से अमेरिकी किसानों को नुकसान?

विशेषज्ञों और इंडस्ट्री के अनुसार नहीं। भारत का बासमती चावल प्रीमियम श्रेणी में आता है और अमेरिकी रेगुलर राइस से अलग है। अमेरिकी किसानों की उपज और भारतीय चावल के बीच बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं है।

भारतीय चावल अमेरिकी बाजार का केवल 2% प्रभावित करता है। इसका अमेरिकी किसानों पर कोई बड़ा असर नहीं है।

भारतीय चावल पर टैरिफ बढ़ने से अमेरिकी किसानों को कोई फायदा नहीं होगा। महंगी अमेरिकी खेती और लेबर कॉस्ट के कारण अमेरिकी चावल की कीमत अधिक है। भारतीय चावल महंगा होने पर भी लोग इसे खरीदेंगे।

यदि टैरिफ बढ़ा तो असर क्या होगा?

भारत 179 देशों को चावल निर्यात करता है। अमेरिका में भारत का योगदान मात्र 3% है। बासमती और नॉन-बासमती की वैश्विक मांग इतनी अधिक है कि अमेरिका में टैरिफ बढ़ने पर भारत को कोई खास नुकसान नहीं होगा।

टैरिफ के बढ़ने से कुछ एक्सपोर्ट कंपनियों को मामूली घाटा हो सकता है, लेकिन वैश्विक डिमांड की वजह से कुल निर्यात प्रभावित नहीं होगा।

भारत ने चावल निर्यात में विश्व नेता का स्थान बनाया

1960 के दशक में भारत खाद्य संकट से जूझ रहा था। अमेरिका ने PL‑480 स्कीम के तहत लाखों टन लाल गेहूं सप्लाई किया। उस समय भारत में अकाल और फसल न होने के कारण लोगों को गंभीर मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

1965-1968 के बीच भारत ने हरित क्रांति लागू की। इसमें नई किस्मों के धान, उन्नत सिंचाई, आधुनिक कृषि तकनीक, MSP और सरकारी खरीद नीतियों को लागू किया गया। इससे पैदावार बढ़ी और भारतीय चावल की गुणवत्ता विश्व स्तर पर पहुंची।

आज भारत वैश्विक चावल निर्यात का लगभग 40% हिस्सा संभालता है और दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बन चुका है।

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Shreeom Singh

Shreeom Singh is a Digital Journalist with over 3 years of experience in the media industry. Having worked with prestigious organizations like Bharat 24, Network 10, and APN News. Shreeom specializes in a wide spectrum of beats, including World, Sports, Business, Lifestyle, and Health. He is dedicated to delivering well-researched and engaging stories to a global audience.

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