S-400 से SU-57 फाइटर जेट तक… टैरिफ में फंसे रहे ट्रंप, अजित डोभाल नेे रूस में कर दिया बड़ा खेला, जानें मामला
नई दिल्ली: दुनिया की राजनीति जब करवट लेती है, तो उसके पीछे कई ऐसे फैसले होते हैं जो आम नजरों से दूर होते हैं। कुछ ऐसा ही हो रहा है इन दिनों भारत, रूस और अमेरिका के रिश्तों में। एक ओर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर टैरिफ का हथियार चला रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे विश्वसनीय रणनीतिक दूत अजित डोभाल रूस की यात्रा पर हैं, जहां वो भविष्य की एक ऐसी नींव रख रहे हैं, जो भारत की सुरक्षा, ऊर्जा और आत्मनिर्भरता की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
डोनाल्ड ट्रंप का भारत के खिलाफ यह टैरिफ हमला यूं ही नहीं आया। अमेरिका लगातार उन देशों से नाराज दिख रहा है, जो रूस से तेल खरीद रहे हैं या उसके साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहे हैं। भारत ने भी रूस से एनर्जी इंपोर्ट जारी रखा, और S-400 जैसे मिसाइल डिफेंस सिस्टम की डील की। इस पर ट्रंप ने भारत पर कुल 50% टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया। इसका असर अब दिखने भी लगा है. 7 अगस्त से पहला 25% टैरिफ लागू हो चुका है और 27 अगस्त से दूसरा 25% भी लगने वाला है।
लेकिन भारत अमेरिका की इस ‘दबाव नीति’ के आगे झुकने के मूड में नहीं है। बल्कि उसने साफ कर दिया है कि वह अपने सामरिक हितों और सुरक्षा के मुद्दों पर किसी भी दबाव में समझौता नहीं करेगा। यही वजह है कि जब वाशिंगटन से तनाव का माहौल है, तब डोभाल की मास्को यात्रा भारत की रणनीतिक दृढ़ता को दर्शाती है।
डोभाल की यात्रा: सिर्फ एक दौरा नहीं, एक रणनीति
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की रूस यात्रा सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा है। बताया जा रहा है कि इस यात्रा का फोकस S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की अतिरिक्त यूनिट्स की खरीद और उनके रखरखाव (MRO) को भारत में स्थापित करने की दिशा में है। यह कदम भारत को सैन्य आत्मनिर्भरता की दिशा में और मजबूत करेगा।
इस यात्रा के दौरान रूस के साथ Su-57 जैसे पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर भी बातचीत हो सकती है। भारत पहले ही अमेरिका के F-35 जेट को नकार चुका है और चीन-पाकिस्तान की बढ़ती वायुशक्ति को देखते हुए, भारत को स्टील्थ फाइटर जेट की तत्काल आवश्यकता है। ऐसे में रूस के Su-57 फाइटर जेट भारत की जरूरतों को तुरंत पूरा कर सकते हैं, जबकि देसी AMCA प्रोजेक्ट अभी विकास के चरण में है।
ऑपरेशन सिंदूर: भारत की सैन्य ताकत की झलक
डोभाल की रूस यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब हाल ही में किए गए ऑपरेशन सिंदूर ने पूरी दुनिया को भारत की सैन्य क्षमताओं का अहसास कराया है। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान और पीओके स्थित 9 आतंकी ठिकानों पर बेहद सटीक और घातक हमले किए गए। कहा जा रहा है कि इसमें रूस से मिले S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह वही मिसाइल सिस्टम है जिसे अमेरिका ने खुद भी खरीदा नहीं और भारत के खरीदने पर आपत्ति जताई थी।
ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने न केवल आतंकियों को जवाब दिया, बल्कि यह भी संदेश दिया कि भारत अब ‘स्ट्रैटजिक साइलेंस’ की नीति नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट स्ट्राइक’ की रणनीति पर काम कर रहा है।
रक्षा के साथ-साथ ऊर्जा साझेदारी भी मजबूत
इस यात्रा का एक और अहम पहलू है ऊर्जा सुरक्षा। रूस से कच्चा तेल खरीदने पर अमेरिका की नाराजगी लंबे समय से चल रही है, खासतौर पर यूक्रेन युद्ध के बाद से। लेकिन भारत का रुख साफ है सस्ता और भरोसेमंद तेल अगर रूस से मिलता है तो वह अपनी जनता के हित में उसे जरूर खरीदेगा।
NSA डोभाल की यह यात्रा इस ऊर्जा सहयोग को और मजबूती देने की दिशा में भी देखी जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत रूस के साथ लॉन्ग-टर्म एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट्स और पाइपलाइन विकल्पों पर भी चर्चा कर रहा है, जिससे भारत की ऊर्जा आपूर्ति आने वाले सालों में भी स्थिर और सुरक्षित बनी रहे।
वैश्विक दबाव बनाम भारत की स्वतंत्र नीति
डोभाल की यात्रा की एक दिलचस्प बात यह है कि उसी समय अमेरिका के विशेष दूत स्टीवन विटकॉफ भी रूस में मौजूद हैं। यह इस बात का संकेत है कि अमेरिका खुद भी रूस के साथ लगातार संवाद में बना हुआ है, लेकिन भारत को उस पर उंगली उठाने में कोई हिचक नहीं दिखा रहा। यह दोहरा मापदंड भारत की कूटनीति के लिए एक चुनौती है, लेकिन डोभाल जैसे अनुभवी रणनीतिकार के नेतृत्व में भारत ने दिखा दिया है कि वह अब केवल ‘दबाव’ नहीं, ‘डील’ के आधार पर रिश्ते तय करेगा।
भविष्य की ओर एक मजबूत कदम
भारत-रूस की यह बढ़ती साझेदारी केवल रक्षा उपकरणों तक सीमित नहीं रहेगी। यह दोस्ती अब औद्योगिक, ऊर्जा, तकनीकी और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भी विस्तार लेने जा रही है। यह सिर्फ दो देशों की रणनीतिक साझेदारी नहीं, बल्कि उन मूल्यों की साझेदारी है जो संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और परस्पर सम्मान पर आधारित हैं।
भारत अमेरिका से मित्रता के पक्ष में है, लेकिन वह यह भी साफ कर चुका है कि कोई भी देश उसे अपने हितों के खिलाफ फैसले लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। S-400 हो, Su-57 हो या तेल भारत अब आत्मविश्वास और अपने हितों के आधार पर फैसले कर रहा है, और यही नई भारत की पहचान है।