AI Videos: पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किए गए वीडियो तेजी से बढ़े हैं। तकनीक इतनी उन्नत हो चुकी है कि कई बार आम यूजर के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि सामने दिख रहा वीडियो असली है या फिर एआई की मदद से तैयार किया गया है। इसी वजह से कई लोग ऐसे वीडियो को सच मानकर उन पर भरोसा कर लेते हैं, जिससे भ्रम और गलत जानकारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
इस समस्या को कम करने के लिए गूगल ने अपने जेमिनी (Gemini) ऐप में एक नया फीचर जोड़ा है, जो यह तुरंत बता सकता है कि कोई वीडियो एआई से जनरेट किया गया है या नहीं। इससे पहले गूगल इसी तरह की सुविधा इमेज वेरिफिकेशन के लिए पेश कर चुका है।
कैसे काम करता है जेमिनी का नया फीचर?
इस नए फीचर का इस्तेमाल करना बेहद आसान रखा गया है, ताकि आम यूजर भी बिना किसी तकनीकी जानकारी के वीडियो की जांच कर सके।
सबसे पहले यूजर को:
- जेमिनी ऐप खोलना होगा
- उस वीडियो को अपलोड करना होगा, जिसकी सच्चाई जाननी है
- वीडियो अपलोड करने के बाद एक साधारण सवाल पूछना होगा, जैसे – “क्या यह वीडियो गूगल एआई से बनाया गया है?”
- इसके बाद जेमिनी वीडियो को स्कैन करता है और यह जांचता है कि उसमें SynthID मौजूद है या नहीं।
क्या है SynthID?
SynthID गूगल द्वारा विकसित एक खास डिजिटल पहचान (डिजिटल मार्कर) है। यह मार्कर गूगल के एआई टूल्स से बनाए गए कंटेंट—चाहे वह वीडियो हो, इमेज हो या ऑडियो—में छिपे रूप में जोड़ा जाता है।
यह मार्कर आम इंसान की आंखों या कानों से दिखाई या सुना नहीं जा सकता, लेकिन गूगल के सिस्टम इसे पहचान सकते हैं। इसी तकनीक की मदद से जेमिनी यह तय करता है कि कंटेंट एआई जनरेटेड है या नहीं।
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वीडियो और ऑडियो, दोनों की होती है जांच
यह फीचर सिर्फ वीडियो की तस्वीरों तक सीमित नहीं है। जेमिनी वीडियो के विजुअल और ऑडियो दोनों हिस्सों को स्कैन करता है।
स्कैन पूरा होने के बाद ऐप यह भी बता देता है कि:
- वीडियो के किस हिस्से में एआई जनरेटेड कंटेंट इस्तेमाल हुआ है
- क्या सिर्फ ऑडियो एआई से बना है या विजुअल भी
इससे यूजर को वीडियो की पूरी डिटेल मिल जाती है और वह बेहतर तरीके से उसकी ऑथेंटिसिटी को समझ सकता है।
कुछ सीमाएं भी हैं
हालांकि यह फीचर काफी उपयोगी है, लेकिन फिलहाल इसकी कुछ सीमाएं तय की गई हैं:
- केवल 100MB तक के वीडियो स्कैन किए जा सकते हैं
- वीडियो की अधिकतम लंबाई 90 सेकंड होनी चाहिए
गूगल का कहना है कि आगे चलकर इन सीमाओं को बढ़ाया जा सकता है।
पूरी दुनिया में हुआ रोलआउट
गूगल ने इस फीचर को भारत समेत दुनिया के अन्य देशों में भी रोल आउट कर दिया है। कंपनी का मानना है कि इससे सोशल मीडिया पर फैलने वाले संदिग्ध और भ्रामक वीडियो की पहचान करना आसान होगा।
गूगल के अनुसार, यह फीचर खासतौर पर उन लोगों के लिए मददगार है जो किसी वीडियो की सच्चाई को लेकर कंफ्यूज रहते हैं और यह तय करना चाहते हैं कि वह वीडियो भरोसेमंद है या नहीं।
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