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बिहार चुनाव में क्यों नहीं चला प्रशांत किशोर का जादू, क्यों पिछड़ गई जनसुराज पार्टी? जानें वजहें

Bihar Election Result: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जन सुराज पार्टी को लेकर जो उम्मीदें बांधी गई थीं, वे शुरुआती रुझानों में ध्वस्त होती दिखाई दे रही हैं। राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (PK) ने पिछले कुछ वर्षों में खुद को बिहार के राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित करने की कोशिश की थी। उन्होंने दावा किया था कि उनकी पार्टी राज्य की राजनीति में “नई दिशा” देगी और पारंपरिक समीकरणों को तोड़ देगी।

जन सुराज ने शुरुआत में 243 में से लगभग सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने की योजना बनाई, और अंततः 240 सीटों पर चुनाव लड़ा। हालांकि, परिणामों की शुरुआती तस्वीर इस ओर इशारा करती है कि पार्टी न केवल अपने दावों से बहुत पीछे रह गई, बल्कि कई जगह उसका खाता तक खुलता मुश्किल लग रहा है।

बिहार की जटिल राजनीति में नई पार्टी के संघर्ष को समझने के लिए हमें उन 5 मुख्य कारणों पर नज़र डालनी होगी जिनकी वजह से जन सुराज का जनाधार वास्तविकता में तब्दील नहीं हो सका।

  1. ग्रामीण इलाकों में सीमित पहचान और कमजोर पहुंच

बिहार की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। निर्वाचन क्षेत्र जितने गहरे और जातीय रूप से जटिल हों, नई पार्टियों के लिए वहां पैठ बनाना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है।

जन सुराज की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही कि—

  • गांवों में उसकी पहचान बहुत सीमित थी
  • बड़ी संख्या में मतदाता पार्टी के चुनाव चिह्न और उम्मीदवारों को पहचान तक नहीं पाए
  • PK की 3,500+ किमी की पदयात्रा के बावजूद ग्रामीण इलाकों में मजबूत नेटवर्क खड़ा नहीं हो सका

बिहार में स्थापित दल दशकों से बूथ और पंचायत स्तर तक मजबूत संगठन बनाए हुए हैं। इनके मुकाबले जन सुराज की उपस्थिति अपेक्षाकृत कमजोर थी, जिसके कारण उसका संदेश अंतिम पंक्ति के मतदाता तक नहीं पहुँच पाया।

  1. संगठनात्मक ढांचे में कमी और आंतरिक मतभेद

प्रशांत किशोर ने जन सुराज को पारंपरिक राजनीतिक ढांचे के बजाए “अभियान-आधारित मॉडल” पर खड़ा किया। पार्टी के प्रचार का केंद्र बिंदु PK स्वयं थे, न कि मजबूत कार्यकर्ता नेटवर्क।

संगठन की कमज़ोरियाँ:

  • पार्टी ने अनुभवी कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ कर कई बाहरी और नए लोगों को सीधे टिकट दे दिए
  • कई वरिष्ठ और प्रारंभिक सदस्य टिकट वितरण से नाराज़ होकर पार्टी से दूर हो गए
  • कुछ लोगों ने खुलेआम कहा कि निर्णय प्रक्रिया लोकतांत्रिक नहीं थी
  • पूर्व IPS अधिकारी आनंद मिश्रा सहित कई प्रमुख चेहरे पार्टी छोड़ चुके थे

इन घटनाओं से यह संदेश गया कि पार्टी अभी शुरुआती अवस्था में संगठनात्मक रूप से परिपक्व नहीं है।

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  1. जातीय समीकरणों को चुनौती देने में असफलता

बिहार की राजनीति में नीतियों से ज़्यादा असर जातीय सामाजिक संरचना का होता है।
जन सुराज ने मुद्दों को केंद्र में रखा—

  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • रोजगार
  • शराबबंदी पर नई बहस

लेकिन समस्या यह रही कि अधिकांश वोटर जातीय गोलबंदी को छोड़कर “नई राजनीति” के साथ जाने को तैयार नहीं थे।

खासकर:

  • मुस्लिम और कुछ अन्य जातीय समूहों ने भाजपा को रोकने के प्राथमिक लक्ष्य से महागठबंधन को सुरक्षित विकल्प माना
  • OBC और EBC में जन सुराज की पकड़ बहुत सीमित रही
  • भूमिहार, राजपूत, यादव, कुर्मी जैसे निर्णायक समुदायों में भी पार्टी नई होने के कारण संदेह रहा
  • PK का सामाजिक मेसेजिंग जातीय राजनीति के स्थापित ढांचे को तोड़ने में सक्षम नहीं हो पाया।
  1. दबाव और उम्मीदवारों का नामांकन वापस लेना

PK ने चुनाव के दौरान कई बार कहा कि बड़े राजनीतिक दल खासकर भाजपा उनके उम्मीदवारों को दबाव, धमकी या लालच देकर नामांकन वापस लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

इसका असर:

  • कुछ सीटों पर उम्मीदवारों ने वास्तव में नामांकन वापस ले लिया
  • इससे कार्यकर्ताओं में भ्रम और असमंजस पैदा हुआ
  • मतदाताओं के बीच यह संदेश गया कि नई पार्टी खुद को सुरक्षित नहीं कर पा रही
  • चुनावी मोमेंटम टूट गया

प्रशांत किशोर ने इसे “लोकतंत्र की हत्या” कहा, लेकिन चुनावी संकेतक यह बताते हैं कि इस दबाव का सीधा असर उनके प्रदर्शन पर पड़ा।

  1. प्रशांत किशोर का खुद चुनाव न लड़ना

राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब कोई नेता नई पार्टी बनाता है, तो चुनाव लड़कर जनता को यह संदेश देता है कि वह “जोखिम उठाने को तैयार है”।

लेकिन PK ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। उन्होंने कहा कि उनका चुनाव लड़ना प्राथमिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि “व्यवस्था में परिवर्तन” उनका बड़ा मिशन है।

मतदाताओं पर इसका प्रभाव:

  • कई लोगों को लगा कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुद दांव लगाने को तैयार नहीं
  • सवाल उठा कि अगर PK ही मैदान में नहीं हैं, तो पार्टी किस दिशा में बढ़ेगी?
  • इससे कार्यकर्ताओं में भी अनिश्चितता बढ़ी

राजनीति में “विश्वास” और “नेतृत्व की उपस्थिति” दोनों अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं—यहाँ जन सुराज पिछड़ गया।

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Shreeom Singh

Shreeom Singh is a Digital Journalist with over 3 years of experience in the media industry. Having worked with prestigious organizations like Bharat 24, Network 10, and APN News. Shreeom specializes in a wide spectrum of beats, including World, Sports, Business, Lifestyle, and Health. He is dedicated to delivering well-researched and engaging stories to a global audience.

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