भारत ने किया अग्नि-5 मिसाइल का सफल परीक्षण, इसके रेंज में पाकिस्तान, चीन, तुर्की जैसे कई देश, जानें इसकी ताकत

AGNI-5
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AGNI -: जब देश की सीमाओं पर खतरे मंडराते हैं, तब जवाब सिर्फ शब्दों से नहीं, ताकत से दिया जाता है। भारत ने ऐसा ही कुछ कर दिखाया है, एक ऐसी मिसाइल का सफल परीक्षण कर के, जो दुश्मनों को चेतावनी देती है कि अब भारत न केवल सुनता है, बल्कि जवाब देना भी जानता है। ओडिशा के चांदीपुर से भारत ने अपनी पहली इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया है। यह सिर्फ एक मिसाइल का परीक्षण नहीं था, बल्कि यह भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता और सैन्य ताकत की गूंज थी।

अग्नि-5 कोई साधारण मिसाइल नहीं है। यह इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) है, जिसकी रेंज 5000 किलोमीटर से भी अधिक है। यानी यह मिसाइल दिल्ली से चलकर चीन के किसी भी कोने, पाकिस्तान के किसी भी अड्डे, और तुर्किये जैसे देशों तक पहुंच सकती है।

इसमें जो तकनीक इस्तेमाल हुई है, वो भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करती है, जिनके पास MIRV (Multiple Independently Targetable Re-entry Vehicle) तकनीक है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत ये है कि एक ही मिसाइल कई अलग-अलग लक्ष्यों को एक साथ नष्ट कर सकती है। यह युद्ध में रणनीति और समय दोनों को बदलने वाली शक्ति है।

क्यों खास है MIRV तकनीक?

MIRV तकनीक का नाम सुनने में जितना जटिल है, उसकी शक्ति उससे कहीं अधिक विस्फोटक है। पारंपरिक मिसाइलें केवल एक टारगेट को निशाना बना सकती हैं, लेकिन MIRV तकनीक से लैस अग्नि-5 एक साथ कई टारगेट्स पर हमला कर सकती है और वो भी सैकड़ों किलोमीटर के फासले पर मौजूद हों तो भी।

इसका मतलब ये है कि अगर दुश्मन ने अपने बंकर, कंट्रोल रूम और हथियार गोदाम अलग-अलग जगह बनाए हैं, तो अग्नि-5 को बार-बार दागने की जरूरत नहीं। एक ही लॉन्च में दुश्मन के कई सिस्टम तबाह किए जा सकते हैं। यह न सिर्फ सैन्य दृष्टिकोण से फायदेमंद है, बल्कि युद्ध के दौरान संसाधनों की बचत भी करता है।

कितनी तेज़, कितनी घातक है अग्नि-5?

इस मिसाइल की रफ्तार किसी सुपरहिरो की तरह है। इसकी स्पीड है मैक 24 यानी ये आवाज की रफ्तार से 24 गुना तेज उड़ती है। जब कोई चीज़ इतनी तेज हो, तो उसको रोकना नामुमकिन हो जाता है। यह मिसाइल 29,401 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से टारगेट की ओर बढ़ती है।

इसकी लंबाई 17 मीटर और वजन करीब 50 टन है। यह 1500 किलो तक का न्यूक्लियर वॉरहेड ले जा सकती है और जमीन में 100 मीटर गहराई तक घुसकर दुश्मनों के बंकर और छिपे ठिकानों को तबाह कर सकती है। इसकी यह गहराई और मारक क्षमता इसे एक “बंकर बस्टर” मिसाइल बना देती है।

चीन और पाकिस्तान के लिए खुला संदेश

अग्नि-5 का परीक्षण केवल तकनीकी परीक्षण नहीं था, यह एक रणनीतिक और राजनीतिक बयान था। पाकिस्तान और चीन दो ऐसे देश जो अक्सर भारत के खिलाफ अपने मंसूबे पालते रहते हैं अब अच्छी तरह समझ लें कि भारत पहले से कहीं ज्यादा तैयार, सशक्त और आत्मनिर्भर है।

चीन ने अपने पहाड़ी इलाकों में और पाकिस्तान ने अपनी सीमाओं के भीतर मजबूत बंकर और जमीन के नीचे कमांड सेंटर बनाए हुए हैं। अग्नि-5 जैसी मिसाइलें उन ठिकानों को सीधे निशाना बना सकती हैं, चाहे वो पहाड़ों के पीछे छिपे हों या जमीन के भीतर।

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भारत के लिए क्यों है यह मिसाइल बेहद जरूरी?

आज के दौर में, जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध की चिंगारियां उठ रही हैं – चाहे वह ईरान-इज़राइल संघर्ष हो या पाकिस्तान की ओर से लगातार सीमा उल्लंघन, भारत को अपनी सुरक्षा के लिए हर स्तर पर तैयार रहना होगा।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से भारत अपनी मिसाइल शक्ति को लगातार मजबूत कर रहा है। अग्नि-5 उसी योजना का हिस्सा है, जो यह सुनिश्चित करती है कि भारत सिर्फ रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक सुरक्षा रणनीति भी अपना सके।

अग्नि-5: भविष्य की लड़ाई की मिसाइल

ट्रेडिशनल वॉर के समय अब लगभग खत्म हो चुके हैं। भविष्य की लड़ाई तकनीक और दूर से मार करने वाली क्षमताओं पर निर्भर करेगी। अग्नि-5 भारत को उस भविष्य के लिए तैयार करती है, जहां दूरी मायने नहीं रखती, बल्कि सटीकता और ताकत सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं।

यह मिसाइल देश के किसी भी हिस्से में तैनात की जा सकती है और इसकी कैनिस्टर टेक्नोलॉजी के कारण इसे ट्रांसपोर्ट करना आसान है। यानी यह एक चलती-फिरती रणनीतिक ढाल की तरह काम करती है।

MIRV तकनीक का इतिहास और भारत की छलांग

MIRV तकनीक कोई नई बात नहीं है। इसे सबसे पहले अमेरिका ने 1970 में विकसित किया था। बाद में सोवियत संघ, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस ने भी इसे अपनाया। लेकिन भारत ने इसे आत्मनिर्भर तरीके से तैयार करके यह दिखा दिया है कि हम किसी से पीछे नहीं।

अब भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया है, जो MIRV से लैस ICBM बना सकते हैं और उसका परीक्षण भी कर सकते हैं। यह सिर्फ सैन्य उपलब्धि नहीं, वैज्ञानिक और तकनीकी स्वावलंबन का भी प्रतीक है।

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