क्रिप्टो गेम, दुर्लभ खनिज भंडार, मिडिल ईस्ट… पाकिस्तान पर इतने मेहरबान क्यों हैं ट्रंप? जानें वजह
पिछले कुछ समय से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख में एक बड़ा बदलाव साफ नजर आ रहा है। जिस पाकिस्तान को अमेरिका ने पहले आतंकवाद के अड्डे के रूप में देखा था, आज उसी पाकिस्तान से ट्रंप गले मिलने को तैयार हैं। भारतीय नजरिए से देखें तो ये बदलाव सिर्फ चौंकाने वाला नहीं, बल्कि चिंताजनक भी है। सवाल उठता है क्या ट्रंप अपनी निजी फायदे के लिए भारत-अमेरिका की मजबूत दोस्ती को दांव पर लगा रहे हैं?
पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। IMF की शर्तों, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी ने वहां की सरकार की नींद उड़ा रखी है। लेकिन इस बुरी स्थिति में भी पाकिस्तान ने एक नया रास्ता खोजा है- क्रिप्टो करेंसी। हाल ही में पाकिस्तान ने ‘पाकिस्तान क्रिप्टो काउंसिल’, जिसे अब ‘पाकिस्तान डिजिटल एसेट अथॉरिटी’ कहा जा रहा है, की स्थापना की है। इसका मकसद है क्रिप्टो को कानूनी रूप देना और देश को डिजिटल फाइनेंस की तरफ ले जाना।
पाकिस्तान में ट्रंप के परिवार का क्रिप्टो गेम
इस पूरे खेल में दिलचस्प बात ये है कि ट्रंप के परिवार का इस क्रिप्टो गेम में गहरा दखल है। वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल (WLF) नाम की अमेरिकी संस्था, जो ट्रंप के बेटों एरिक, डोनाल्ड जूनियर और दामाद जेरेड कुशनर के नियंत्रण में है, पाकिस्तान के साथ मिलकर क्रिप्टो और ब्लॉकचेन प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। इस साझेदारी से ट्रंप परिवार को आर्थिक लाभ मिलता है और पाकिस्तान को डिजिटल उभरने का मौका।
सिर्फ इतना ही नहीं, बिनेंस के पूर्व सीईओ चांगपेंग झाओ, जिन्हें अमेरिका में कानूनी संकट का सामना करना पड़ा था, अब पाकिस्तान में क्रिप्टो नीति बनाने में सलाह दे रहे हैं। यह साफ संकेत है कि ट्रंप और उनके सहयोगी पाकिस्तान को एक नई डिजिटल प्रयोगशाला बना रहे हैं।
पाकिस्तान के खनिजों पर ट्रंप की बढ़ती नजर
डोनाल्ड ट्रंप की निगाह सिर्फ क्रिप्टो तक सीमित नहीं है। उन्होंने पाकिस्तान के खनिज संसाधनों को लेकर भी बड़ी दिलचस्पी दिखाई है। पाकिस्तान के पास अनुमानतः 8 से 50 ट्रिलियन डॉलर तक की खनिज संपत्ति मौजूद है, जिसमें तेल, तांबा, सोना, लिथियम और दुर्लभ मृदा तत्व शामिल हैं। ये सब खनिज आने वाले समय में बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और क्लीन एनर्जी सेक्टर के लिए बेहद जरूरी होंगे।
ट्रंप का दावा है कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ मिलकर तेल और खनिज भंडारों की खोज और निकासी करेगा। उन्होंने यहां तक कह दिया कि आने वाले समय में भारत को पाकिस्तान से तेल खरीदना पड़ सकता है। जाहिर है, ये बयान भारत के लिए न सिर्फ कूटनीतिक चुनौती है, बल्कि एक संकेत भी है कि ट्रंप की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं।
चीन की तुलना में अमेरिका अब पाकिस्तान को खनिज सप्लाई के वैकल्पिक स्रोत के रूप में देख रहा है। चीन पर अमेरिका की खनिज निर्भरता लंबे समय से चिंता का विषय रही है। बलूचिस्तान के रेको दिक जैसी खदानें अमेरिकी कंपनियों के लिए बड़े आकर्षण का केंद्र बन चुकी हैं। यही कारण है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ खनिज समझौते की दिशा में तेज कदम बढ़ाए हैं।
मध्य-पूर्व में अमेरिका के लिए पुल बनता पाकिस्तान
मध्य-पूर्व की राजनीति जटिल और संवेदनशील है। अमेरिका और ईरान के रिश्ते दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान दोनों देशों के साथ रिश्ते रखता है। ट्रंप पाकिस्तान को इस क्षेत्र में एक रणनीतिक पुल की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।
पाकिस्तान, ईरान के साथ सीमा साझा करता है और राजनयिक संबंध भी रखता है। जून 2025 में पाकिस्तान ने अमेरिकी हवाई हमलों की आलोचना करते हुए शांतिपूर्ण समाधान की मांग की थी। भले ही ट्रंप ने इस पर प्रतिक्रिया न दी हो, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते गहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
ट्रंप की इस रणनीति के पीछे दो मकसद नजर आते हैं ईरान के साथ निजी स्तर पर डिप्लोमैटिक बातचीत का रास्ता खोलना और अफगानिस्तान पर अप्रत्यक्ष नजर बनाए रखना। ट्रंप का मानना है कि पाकिस्तान, अमेरिका के लिए इस भू-राजनीतिक क्षेत्र में बेहद उपयोगी भूमिका निभा सकता है।
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