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भारत, रूस, चीन से बैर कर खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे ट्रंप, क्या अब शुरू होगा डॉलर का पतन?

नई दिल्ली: कभी भारत और अमेरिका के बीच का रिश्ता दुनिया भर में सबसे मजबूत रणनीतिक साझेदारियों में गिना जाता था। लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से आने वाले सामानों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का ऐलान किया है, जो पहले से लागू 25% शुल्क के साथ मिलकर अब कुल 50% हो गया है।

यह फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि भारत ने रूस से तेल की खरीद जारी रखी, जबकि अमेरिका चाहता था कि भारत इस व्यापार को बंद कर दे।

भारत पर यह दबाव ऐसे समय में बनाया गया है जब चीन, ब्राजील और रूस पहले से ही अमेरिकी नीतियों से नाराज हैं। एक वक्त था जब अमेरिका चाहता था कि भारत उसके साथ खड़ा हो, लेकिन अब वही अमेरिका भारत के खिलाफ आर्थिक हथियार चला रहा है। सवाल यह है- क्या अमेरिका अपनी ही वैश्विक स्थिति को कमजोर कर रहा है?

डॉलर की बादशाहत को क्यों लगने लगा है खतरा?

अमेरिकी डॉलर को वैश्विक रिजर्व करेंसी यानी ‘विश्व मुद्रा’ का दर्जा हासिल है। यह स्थान सिर्फ आर्थिक ताकत से नहीं, विश्वास से बना है- उस भरोसे से कि अमेरिका दुनिया की सबसे स्थिर अर्थव्यवस्था है, और वहां से व्यापार करने पर भरोसा किया जा सकता है।

लेकिन अब विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अमेरिका इस भरोसे को खुद ही नुकसान पहुंचा रहा है। भारत के खिलाफ ट्रंप का यह टैरिफ कदम दुनिया को एक खतरनाक संकेत दे रहा है: “अगर अमेरिका को आपकी नीतियां पसंद नहीं आईं, तो वह व्यापार को हथियार बना सकता है।”

भारत जैसे बड़े और उभरते देशों को यह संकेत अच्छा नहीं लग रहा। फाइनेंशियल एडवाइजर गुरमीत चड्ढा ने तो इसे सीधे शब्दों में कह दिया- “डॉलर के दबदबे की उलटी गिनती शुरू हो गई है।”

उनका कहना है कि जब व्यापार और डिप्लोमेसी को राजनीति और दबाव के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, तो इससे अमेरिका को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है। उन्होंने चेताया कि यह ‘तानाशाही सोच’ अमेरिका को आर्थिक मोर्चे पर अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती है।

भारत का जवाब: अब आत्मनिर्भरता पर चलेगा देश

भारत ने अमेरिका के इस फैसले को “अनुचित और तर्कहीन” करार दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत की तेल खरीद उसकी ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों पर आधारित है, और यह देश की संप्रभुता का सवाल है।

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने 1.4 अरब नागरिकों की जरूरतों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।

साथ ही, यह पहली बार है जब भारत खुले तौर पर यह कह रहा है कि अगर अमेरिका का रवैया यही रहा, तो वह भी डॉलर की पकड़ को कमजोर करने वाली वैश्विक मुहिम में शामिल हो सकता है- यानी डी-डॉलराइजेशन। अब तक भारत इस रास्ते से थोड़ा अलग रहा, लेकिन अब अमेरिका के एकतरफा फैसलों ने स्थिति को बदल दिया है।

चार महाशक्तियों से बैर: क्या अमेरिका होगा अलग-थलग?

ट्रंप प्रशासन का यह टैरिफ फैसला सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। चीन, ब्राजील और रूस के साथ भी अमेरिका के रिश्ते लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। अमेरिका अब ऐसे रास्ते पर चलता नजर आ रहा है जहां वह अपनी ही पुरानी साझेदारियों को तोड़ रहा है।

  • भारत से नाराजगी तेल को लेकर है।
  • चीन से तनाव व्यापार और रणनीतिक प्रभुत्व को लेकर है।
  • रूस से तो पहले ही खुले तौर पर संघर्ष है।
  • ब्राजील के साथ भी हालिया कूटनीतिक घटनाएं संबंधों को बिगाड़ रही हैं।

इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका अब दुनिया की चार प्रमुख उभरती और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को खुद से दूर कर रहा है।

क्या यह अमेरिका के लिए कूटनीतिक आत्मघात जैसा नहीं है?

भारत को कितना हो सकता है नुकसान?

भारत हर साल अमेरिका को करीब 80 अरब डॉलर का सामान भेजता है। इनमें दवाइयों, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग गुड्स जैसे प्रोडक्ट शामिल हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, नए टैरिफ के बाद भारत से अमेरिका को होने वाला निर्यात 40% से 50% तक घट सकता है। इससे भारत के कई उद्योगों को बड़ा झटका लग सकता है। खासकर टेक्सटाइल और ऑटोमोबाइल सेक्टर पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ने की आशंका है।

हां, दवा और इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद फिलहाल इस टैरिफ से बचे हुए हैं। लेकिन अगर तनाव और बढ़ता है, तो अमेरिका इन पर भी शुल्क लगा सकता है।

अमेरिकी वार्ताकारों की एक टीम 25 अगस्त को नई दिल्ली पहुंचने वाली है। भारत सरकार इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुकी है कि अगर टैरिफ वापस नहीं लिया गया, तो जरूरी जवाबी कदम उठाए जाएंगे।

क्या डॉलर की बादशाहत का अंत नजदीक है?

डॉलर दशकों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार का आधार रहा है। लेकिन अब एक के बाद एक देश रुपया, युआन या यूरो में व्यापार करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

चीन पहले से युआन को डॉलर का विकल्प बनाने की कोशिश में लगा है। रूस ने यूक्रेन युद्ध के बाद डॉलर पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है। अब भारत भी ऐसे देशों के साथ स्थानीय करेंसी में व्यापार को प्राथमिकता दे रहा है।

यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो अमेरिका को अपने ही बनाए नियमों और फैसलों का आर्थिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

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Shreeom Singh

Shreeom Singh is a Digital Journalist with over 3 years of experience in the media industry. Having worked with prestigious organizations like Bharat 24, Network 10, and APN News. Shreeom specializes in a wide spectrum of beats, including World, Sports, Business, Lifestyle, and Health. He is dedicated to delivering well-researched and engaging stories to a global audience.

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