नई दिल्ली: कभी उन्होंने भीड़ को संबोधित किया था। सिर ऊंचा कर राष्ट्रगीत गाया था। दुनिया के सबसे ताकतवर मंचों पर खड़े होकर अपने देश की बात की थी। लेकिन फिर एक दिन ऐसा आया जब वही नेता, जो कभी खुद को अजेय समझते थे, भीड़ के डर से, गोलियों की आवाज़ों के बीच, अपने ही देश की मिट्टी को हमेशा के लिए छोड़कर भाग निकले। यह कोई फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है राजनीति के उस अंधेरे चेहरे की, जहां सत्ता का अंत हमेशा शांति से नहीं होता।
आज हम बात करेंगे उन विश्व नेताओं की, जिनका तख्त पलटा और उन्हें मजबूरन देश छोड़कर निर्वासन का जीवन अपनाना पड़ा। इनमें से कुछ अब भी सियासत में लौटने की कोशिश कर रहे हैं, तो कुछ गुमनामी की चादर ओढ़ चुके हैं।
शेख हसीना को सिर्फ 45 मिनट में देश छोड़ना पड़ा
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के लिए बीते साल की एक रात किसी दुखद सपने से कम नहीं रही। ढाका की सड़कों पर हजारों लोग उमड़ पड़े थे। “गणभवन” की ओर बढ़ती भीड़ के हाथों में तख्तियां नहीं, गुस्सा था।
पुलिस और सेना ने मोर्चा संभाला, लेकिन नाकाम रहे। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों ने हसीना को चेताया, “मैडम, अब बहुत देर हो चुकी है, निकल जाइए।” उनके पास सिर्फ 45 मिनट का समय था। भागते वक़्त वे अपने जरूरी सामान भी साथ नहीं ले सकीं। जब भारत के हिंडन एयरबेस पर उतरीं, तो उन्हें सबसे पहले कुछ जरूरी चीजें खरीदनी पड़ीं।
आज उन्हें भारत में निर्वासन का एक साल पूरा हो चुका है। वे गुमनाम और शांत जीवन जी रही हैं, जहां न राजनीति है, न भाषण… बस बीते कल की यादें हैं।
अशरफ गनी: अफगान राष्ट्रपति हेलिकॉप्टर में भरकर ले गए करोड़ों
15 अगस्त 2021 का दिन सिर्फ भारत के लिए नहीं, अफगानिस्तान के लिए भी ऐतिहासिक बन गया। काबुल की सड़कों पर तालिबान के कदमों की गूंज सुनाई दे रही थी। राष्ट्रपति भवन में बैठे अशरफ गनी को समझ आ गया कि अब वापसी नहीं होगी।
उन्होंने बिना किसी विदाई भाषण के राष्ट्रपति भवन छोड़ा। एक हेलिकॉप्टर में सवार हुए और कथित तौर पर 169 मिलियन डॉलर (लगभग 1400 करोड़ रुपये) लेकर UAE भाग निकले। गनी ने बाद में सफाई दी कि उन्होंने खून-खराबा रोकने के लिए ऐसा किया, लेकिन जनता उन्हें “देशद्रोही” और “भगोड़ा” कहने लगी।
आज वे यूएई में शरण लिए हुए हैं और सोशल मीडिया के ज़रिए अपने देश से जुड़े मुद्दों पर बयान देते रहते हैं, लेकिन उनका राजनीतिक जीवन लगभग खत्म हो चुका है।
बशर अल-असद: 24 साल की सत्ता सिर्फ 11 दिनों में ढह गई
बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता की मृत्यु के बाद सीरिया की सत्ता संभाली। शुरुआत में उन्होंने खुद को आधुनिक और उदार नेता के तौर पर पेश किया, लेकिन जब 2011 में अरब क्रांति की लहर सीरिया तक पहुंची, तो असद का असली चेहरा सामने आया।
विद्रोह को कुचलने के लिए उन्होंने सेना का सहारा लिया। रूस और ईरान की मदद से सत्ता बचाई, लेकिन 2024 में हालात फिर बदल गए। इस बार तुर्किये समर्थित गुटों ने विद्रोह किया और सिर्फ 11 दिनों में असद को सत्ता से बेदखल कर दिया गया।
अब वे रूस के मॉस्को शहर में एक सीमित जीवन जी रहे हैं, जहां उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं है। कभी देश के शहंशाह माने जाने वाले असद, अब एक कैद ज़िंदगी में जीने को मजबूर हैं।
जुआन गुआइडो: जिसने खुद को राष्ट्रपति घोषित किया
जुआन गुआइडो की कहानी किसी युवा क्रांतिकारी की तरह शुरू हुई थी। उन्होंने खुद को वेनेजुएला का अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया और अमेरिका समेत दर्जनों देशों ने उन्हें मान्यता भी दी।
गुआइडो के साथ जनता भी थी, लेकिन सत्ता उनके पास कभी नहीं आई। ‘ऑपरेशन लिबर्टी’ नाम से उन्होंने मादुरो को हटाने की कोशिश की, जो विफल रही। नतीजा यह हुआ कि उन्हें देशद्रोह के आरोपों में घसीटा गया, केस दर्ज हुए और समर्थन कम होता गया।
2023 में गुआइडो ने गिरफ्तारी के डर से वेनेजुएला छोड़ दिया और अमेरिका में शरण ली। आज वे वहां रहते हैं और ट्विटर-वीडियो में लोकतंत्र की बातें करते हैं, लेकिन जनता की उम्मीद अब उनके लिए खत्म हो चुकी है।
स्वेतलाना तिखानोव्स्काया: पति की लड़ीं, बच्चों के लिए देश छोड़ा
बेलारूस की राजनीति में स्वेतलाना एक ऐसा नाम बन गईं जिसे कभी गिनती में भी नहीं लिया गया था। पति सर्गेई तिखानोव्स्की को जब चुनाव से पहले जेल भेज दिया गया, तो स्वेतलाना ने उनके लिए लड़ने की ठानी।
धीरे-धीरे वे देशभर की मुख्य विपक्षी नेता बन गईं। लेकिन 2020 के चुनाव में राष्ट्रपति लुकाशेंको ने जब खुद को 80% वोटों से विजयी बताया, तो विरोध सड़कों पर फूट पड़ा।
स्वेतलाना को 24 घंटे बाद अचानक गायब कर दिया गया। बाद में पता चला कि उन्हें बच्चों की जान की धमकी देकर लिथुआनिया भेज दिया गया। अब वे वहां निर्वासन में हैं, जबकि उनके पति को 18 साल की सजा सुनाई गई है।
स्वेतलाना अब भी लोकतंत्र की आवाज़ बुलंद कर रही हैं, लेकिन अपने परिवार से दूर, एक अनजाने देश की सरहदों में कैद हैं।
विक्टर यानुकोविच: खुद को अब भी मानते हैं यूक्रेन के राष्ट्रपति
2010 में विक्टर यानुकोविच यूक्रेन के राष्ट्रपति बने। लेकिन उनका झुकाव यूरोप से ज़्यादा रूस की ओर था। उन्होंने यूरोपीय यूनियन से जुड़ने के समझौते को खारिज कर दिया और इसके खिलाफ पूरे देश में विरोध शुरू हो गया।
फरवरी 2014 में जब प्रदर्शन उग्र हो गया और गोलियों से 100 से ज्यादा लोग मारे गए, तो यानुकोविच देश छोड़कर रूस भाग गए।
आज भी वे खुद को यूक्रेन का वैध राष्ट्रपति मानते हैं, लेकिन न कोई सरकार उन्हें मान्यता देती है, न जनता उन्हें याद करती है। रूस में वे एक राजनैतिक भूत की तरह जीवन जी रहे हैं।
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